बुधवार, 14 मार्च 2007

सहमति के खिलाफ़

हाल ही मे हुई ब्लागर्स मीट की बहुत सी उत्साह्जनक रिपोर्टे पढने और चित्र देखने को मिले. अच्छा है इस तरह के सामूहिक मेल मिलाप होने चाहिए. रिपोर्ट्स पर आई टिप्प्णिया भी उतनी ही जोशीली थी। लेकिन इन तमाम रिपोर्टो और टिप्पणिओ मे कुछ ऐसा है जो नही दिख रहा और जिसे समझा जाना शायद ज़्यादा ज़रूरी है। मै बहुत कम शब्दो मे और सटीक ढग से इन का deconstruct[विखन्डित] कर के अपनी चिन्ता ज़ाहिर करता हू।
जीतु जी ,स्रिजन जी व अन्य कुछ लोगो ने भी कहा "इस तरह के मेल जोल से आम सहमति बनाई जा सकती है और आचार सहिता बनाइ जा सकती है" यह दोनो ही बाते ब्लागिन्ग के उद्देश्य को खत्म करने वाली है। पहला, सहमति की अपेक्शा रखना एकदम गलत है क्योन्कि कोइ भी ब्लागेर अपना मत रखने के लिए स्वतन्त्र है। सहमति की इच्छा रखने वाले समाज मे न तो कुछ नया हो सकता है और न ही व्यक्ति नया सोच सकता है. यह सहमति समूह को चलाने वाले अनुशासन मे तब्दील होते देर नही लगती। और समूह बनते ही एक सन्चालन्कर्ता , अनुशासक, नियन्त्राक की ज़रूरत खडी होती है. वही ब्लागिन्ग का मूल विचार नष्ट हो जाता है. कई बार तो पता भी नही चलता कि वह सहमति कब विचारधारा का रूप ले लेती है। तब शुरु होता है एक दूसरे पर कीचड उछालने का सिलसिला ,कि मै ही सही हू और बाकी सब जो मेरी विचार्धारा को नही मानते गलत है या बेवकूफ़ है ।इसलिए ब्लागिन्ग की दुनिया मे किसी का प्रवेश निषेध मात्र भिन्न विचारधारा के कारण नही किया जाना चाहिए। ताज़ा उदाहरण नारद पर हुए विवाद के रूप मे देखा जा सकता है। इसलिए हमे दूसरो के मतो को सम्मान देना चाहिए और न केवल मतभेदो[conflict of ideas] को स्थान देना चाहिए बल्कि स्वस्थ मानसिकता के लिए ज़रूरी है कि विभेदो को पनपने दिया जाये।निश्चित रूप से ब्लागिन्ग एक सामूहिक क्रियाकलाप लगता है लेकिन गहराई से देखा जाए तो यह एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है।
अगर गैलिलियो दुनिया की सहमति का इतज़ार करता तो शायद ही हम कभी टेलीस्कोप देख पाते. कापरनिकस अगर सहमति से चलता तो इस तथ्य की खोज न कर पाता कि ग्रह प्रिथ्वी के गिर्द नही घूमते बल्कि सूर्य के चक्कर लगाते है. जहा सहमति हुई वही विचारो का खून हुआ. हमे कोई सरकार नही चलानी है कि हमारा सहमत होना ज़रूरी हो. पता नही लोकमन्च ,नारद ,मोहल्ला ब्लागिन्ग को सहमति का मन्च क्यो बनाना चाह्ते है. दूसरा, आचार सहिता की बात भी इसी से जुडी हुई है.[जिसका कम से कम मै समर्थन नही करता]. मै नही मानता कि हम असभ्य है ,अशिष्ट है। जिन्हे अपने बारे मे शन्का हो वो स्वय के लिए आचार सहिता खुद ही बना ले तो बेहतर होगा. मुझे लगता है अनर्गल, अवान्छित स्वयमेव बाहर हो जाएगा क्योकि यह मन्च उन्हे सहन नही करेगा, जैसा अभी कुछ दिनो पहलॆ हुआ।

19 टिप्‍पणियां:

bhupen ने कहा…

बात कुछ-कुछ पते की लगी गुरु. लेकिन ज़्यादा तल्ख मत होईए, वरना अपनी तरह बदनाम हो जाएंगे. हा-हा-हा-हा.

Jitendra Chaudhary ने कहा…

बहुत सही।

भाया, अगर नकाब पहनकर कुछ भी कहना है तो बहुत आसान है। पर्दे के पीछे अगर आप किसी को गाली भी दोगे तो कोई भी आपका कुछ नही बिगाड़ सकेगा। इसलिए जो कहना है, सामने आकर कहो। ये परिवार सबकी सुनता है, सारे निर्णय सामूहिक होते है।

Anupam Pachauri ने कहा…

बात मेँ वज़न है। आपने ये पोस्ट लिख कर अच्छा किया। इस सेल्फ स्टाइल्ड समवेत के मुगालते को साफ करने के लिये ज़रूरी था कि कोई यह सब लिखे। बधाई!
कितनी अजीब बात है कि जहाँ चार ब्लोगर्स मिले नहीँ वहीँ परिवार की ग़लतफहमी गढ ले रहे हैँ। ज़नाब जो खुद को एक परिवार नहीँ मानेँगे तो क्या उनके expresssion अभिव्यक्ती को नकार दोगे? और ये अजीब सा अन्दाज़ है किसी को धमका कर अपनी ग़ैरित्तफाकी ज़ाहिर करने का। जीतेन की टिप्पणी से ऐसा लग रहा है जैसे कह रहे होँ " शहंशाह सबकी सुनता है"। तो यानी फिज़ीकल स्पेस हो या साइबर स्पेस लोग लाठी ले कर ब्लोग्स्पेस नाम की भैँस को कब्जाने के मौके मैँ हैँ।

पहले लगता था कि केवल अमरीका ही एक सैल्फ्स्टाइल्ड बॉस है, यहाँ तो जन जन मेँ अमरीका है। वाह!

अनूप शुक्ला ने कहा…

आलोचकजी, आपकी बात एकदम सच है। मेरा मानना है कि ब्लागिंग को लेकर कोई आचार संहिता जैसी चीज इसके मूल स्वरूप को बदलने की कोशिश करेगी!

notepad ने कहा…

मुझे लगता है परिवार वाली अवधारणा मे ही दिक्कत है. पहले हम परिवार बनाएगे फिर सास-ससुर,जेठ-जेठानी,ननद-बहनोई भी पैदा होगे ही.तब तो हमारा यह परिवार बन जाएगा" कहानी घर घर की"....!! या फिर कोइ ऐसा समूह जो किसी आइडियालाजिकल ग्रुपिन्ग की तरफ़ बढ रहा हो. ध्यान रहे , यह सामूहिक अस्मिता बनाना एक राज्नीतिक उपकरण है एकजुटता का.

masijeevi ने कहा…

I,ve posted two comments non appeared here? whas the matter.

basically I agree with anupam. Jituji shd relook at what he is saying. Please also see that anonymous blogging is key to the blogosphere, one can't deny blogger a right to be anonymous.
'Code of conduct' doctrine has it its problematics and these are duly registered at all possible forums.

manya ने कहा…

Well mujhe aapka lekh aur diye gaye comments padhkar ye lag raha hai ki.. "ALL OF YOU ARE RIGHT"... aur ek achchi baat ye hai ki yahaan kisi na kisi roop mein bloggers ke beech AAM-SAHAMATI dikhaayi deti hai.. badhiya hai.. :)

Srijan Shilpi ने कहा…

"जीतु जी,स्रिजन जी व अन्य कुछ लोगो ने भी कहा- "इस तरह के मेल जोल से आम सहमति बनाई जा सकती है और आचार सहिता बनाइ जा सकती है"

भाई आलोचक जी, पहले यह बताओ कि मैंने ये उपर्युक्त उदगार कहाँ व्यक्त किए? जहाँ तक मुझे ध्यान है कि मैंने यह बात या इस आशय की कोई बात कहीं नहीं लिखी है। ब्लॉगर मीट में कुछ बातें मैंने जरूर उठाई थी और उनपर सबकी राय जानने का प्रयास किया था। लेकिन आप तो वहाँ थे नहीं। यदि होते तो समझ सकते थे कि इस मुद्दे पर आम सहमति की कोई अपेक्षा मैंने नहीं की। लेकिन साथी चिट्ठाकार इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं, यह जानना चाहता था। मैं इस विषय पर समय मिलते ही अवश्य लिखूंगा, जैसा कि मैंने वायदा भी किया है।

दूसरी बात, जो आपका भ्रम दूर करने के लए बताना जरूरी है कि न्यूनतम आचार संहिता का प्रस्ताव हिन्दी चिट्ठाकारी के आम संदर्भ में नहीं, बल्कि नारद के विशेष संदर्भ में है। ऐसे बहुत से चिट्ठे हैं और हो सकते हैं जो नारद पर पंजीकृत न हों। हम उनकी बात नहीं कर रहे।

तीसरी बात, यदि आप भारतीय हैं, भारत में रहते हैं और भारत के संविधान को मानते हैं तो आप संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(क) के तहत दिए गए वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार के साथ जुड़ी शर्तों को कदापि नहीं भूल सकते। वे शर्तें कुछ इस प्रकार हैं - अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता, भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में लगाई गई पाबंदियों के अध्यधीन है।

आपको बोलने की आजादी है, लेकिन आपको इस स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए किसी पर व्यक्तिगत प्रहार करने की आजादी नहीं है। जो बात बैठक में मैंने रखी थी कि हमलोग मुद्दों पर फोकस करते हुए बहस करें, लेकिन आपस में किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार न करें। यदि ऐसा आवेश, उत्तेजना या अनजाने में किसी से हो जाए तो अन्य साथियों द्वारा ध्यान दिलाए जाने पर अपनी भूल स्वीकार कर ले।

यदि आपकी सोच इससे भिन्न है तो फिर आप वाकई स्वतंत्र हैं, अंतर्जाल पर उन्मुक्त विचरण करने और विचार-वमन करते रहने के लिए। ....कीजिए। आप आलोचक जो ठहरे। कोई होगा जो आपका भी उस्ताद होगा इस खेल में। फिर आप उसे रोक लीजिएगा!

masijeevi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
masijeevi ने कहा…

शांत भीम(सृजन) शांत :)
मुझे इस पोस्‍ट में विवादित होने की बहुत सारी संभावनाएं पहले ही दीख पड़ी थीं। इसलिए बहुत ही लंबी टिप्‍पणी लिखी थी पर क्‍या करें...
खैर हममें से एक ने कहा...
'उन्होंने(सृजनजी ने) बैठक में एक विषय रखा कि चिट्ठाकारिता की एक आचार संहिता होनी चाहिये जिसमें व्यक्तिगत प्रहार न हो तथा व्यक्ति अपने लेखन की पूरी सामाजिक और विधिक जिम्मेदारी ले। '

आप यह तो कह सकते हें कि अन्‍य चिट्ठाकारों की इस पर सहमति नहीं थी पर यह कहना कि ऐसा कछ हुआ ही नहीं, शायद ठीक नहीं है। दूसरी बात वही जो मैं पहले कह चुका हूँ कि किसी को इसलिए राय रखने के विरुद्ध 'ध‍मकाना'(...फिर आप उसे रोक लीजिएगा!) कि वह गुमनाम चिट्ठाकारी करता है, शायद इससे आपको कोई रोक तो नहीं सकता पर आप खुद सोच देखें। मैं इस पर अपनी राय अपने चिट्ठे पर रखने की कोशिश आज करूंगा।

और संविधान ...हुम्‍म्‍म्‍म अच्‍छी किताब है। पढ़नी चाहिए। सरकार छापती है...सत्‍तर रूपए।

संजय बेंगाणी ने कहा…

आलोचक महोदय,

आलोचना व निंदा में फर्क है, इसे अप भी समझते होगें. हमने सदा आलोचना क स्वागत किया है मगर निंदा की छुट क्या आप भी देना चाहेगें?

हमने नारद के लिए नियम कायदे बनाए है, न कि निजी चिट्ठो के लिए. आपके मन में आए वह लिखीये. कौन रोकता है?

यहाँ आप द्वारा व मिसीजीवि द्वारा जितुभाई व सृजन शिल्पीजी पर व्यक्तिगत प्रहार किया गया है. मुझे इस पर आपत्ति है.

masijeevi ने कहा…

व्‍यक्तिगत आरोप ???

आपकी आपत्ति सर माथे, पर संजय, ऐसा किस पंक्ति में है। जितेंद्र और सृजन दोनों मेरे लिए विशेष अहमियत रखते हैं, किंतु इसे जाने दें तो भी यह तो स्‍पष्‍ट होना ही चाहिए कि जो तथ्‍य चिट्ठाकार खुद टीप रहा है वह स्‍वाभाविक है कि पब्लिक कंजप्‍शन के लिए है ऐसे में निजी प्रहार कहॉं आया।
और आलोचक के वक्‍तव्‍य में तो कोई भी निजी टिप्‍पणी नहीं है।

मुझे एक जुड़ाव महसूस करने वाले व्‍यक्ति की तरह यह कहना है कि आलोचक नए चिट्ठाकार हैं उन्‍हें आतंकित करने के प्रयासों की बजाय उनकी असहमतियों का सम्‍मान व स्‍वागत किया जाए। मुझसे असहमतियाँ तो खैर मेरे चिट्ठे पर की ही जा सकती हैं।

एक अनसुलझी पहेली : जिन्दगी ने कहा…

मि. आलोचक। वैसे तो मेरे पास इतना समय नहीं है कि ब्लागर्स में अपना समय दे पाऊं। फिर भी आज आपकी आलोचना पर नजर गयी। यह आलोचना कम बल्कि एक कुंठित व्यक्ति के शब्द हैं जो यह व्यक्त करना चाह रहे हैं कि आपको नहीं बुलाया गया तो आपने लेखन के माध्यम से अपनी कुंठा को सबके सामने व्यक्त कर दिया। यह तो वही हाल हुआ कि एक पुस्तक विमोचन में विख्यात आलोचक को नहीं बुलाया गया तो उन्होंने दूसरे दिन उस पुस्तक की काफी बुरी आलोचना पत्रिका में प्रकाशित करवा दी थी। आप तो आलोचक हैं, आपको तो आज से २० वर्ष पहले के इन वरिष्ठ आलोचक के बारे में पता ही होगा। ठीक उसी प्रकार का आपका बर्ताव है।

masijeevi ने कहा…

लीजिए संजय, अपूर्व की इस ऊपरवाली टिप्‍पणी ने कहना आसान कर दिया। देखिए जो आपने कहा आलोचक के लिए, या आलोचक ने कहा सृजन या जितेंद्र के लिए वह मेरी नजर में व्‍यक्तिगत नहीं है। पर ये जो अपूर्व ने कहा आलोचक के लिए वह है व्‍यक्तिगत और बदमज़गी से भरा वकतव्‍य, रोका उसे भी नहीं जा सकता पर बानगी आप देख सकते हैं।
वैसे हे अबूझ पहेली ये आपने कैसे बूझा कि आलोचक वहॉं नहीं थे, वे तो गुमनाम हैं, शायद रहे हों वहीं।......

अनूप शुक्ला ने कहा…

मैंने सबरे लेख पढ़ा था और ब्लागिंग के बारे में अपने विचार व्यक्त किये। अब भी मैं यही मानता हूं कि ब्लागिंग को लेकर कोई आचार संहिता बनाने की बात सफल नहीं होगी।

अब जब फिर से यह सब पढ़ रहा हूं तो अंदाज लगा कि यहां और गहरे अर्थ छिपे हैं। जीतेंन्द्र, सृजन शिल्पी की आलोचना है। आलोचक के विचार हैं।

पता नहीं कितना सही है लेकिन कमेंट पढ़कर यह लगता है यह पोस्ट मसिजीवीजी ने आलोचक के नाम से लिखी है। अगर यह सच है तो यह निहायत बचकाना पन है। एक तो इसलिये कि अपनी बात अगर आप सच मानते हैं तो उसे सबके सामने कहने की हिम्मत रखिये। वैसे तो मेरे लिये मसिजीवीजी भी अनाम हैं और आलोचक भी। लेकिन अगर आप सही में यह पोस्ट मसिजीवी ने लिखी है तो मेरी नजर में बचकाना काम है। इससे कुछ हासिल नहीं होता सिवाय अपना महत्व और सम्मान घटाते हैं आप।

लोकमंच, मोहल्ला एक साइट/ब्लाग है। वे अपनी मनमर्जी के एजेंन्डे पर चलने के स्वतंत्र हैं। उन्होंने अपनी जो भी विचारधारा सोची उसके अनुसार लिखने के लिये आवाहन किया और वे लिख रहे हैं। एक तरफ तो आप ब्लागिंग की स्वतंत्र सोच की बात कहते हैं दूसरी तरफ़ इन साइट/ब्लाग के काम करने के अंदाज पर सवाल उठाते हैं! ये कैसा विरोधा भास है भाई आलोचकजी?

रही जहां तक नारद की बात तो नारद को चलाने के लिये जो लोग जिम्मेदार हैं अभी वे अपने निर्णय के अनुसार अपना काम कर रहे हैं। आपके कुछ सुझाव हैं आप पाठक की हैसियत से, ब्लागर की हैसियत से दीजिये। जो नारद को चलाने वालों को समझ में आयेंगे उनपर अमल किया जायेगा। यह सच है कि निंयत्रण कभी न कभी अनुशासन में तब्दील होता है। लेकिन अराजकता भी तो वरेण्य नहीं है। आज कोई चिट्ठाकार किसी ब्लागर को गाली-गलौज करने लगे ,करता रहे तो लोगों की यह सहज स्वाभाविक प्रतिक्रिया होगी कि नारद का संचालक कम से कम उस चिट्ठे को नारद पर प्रकाशित न होने दे। यह आवश्यक अनुशासन है इसे कोई भी स्वतंत्रता समर्थक मानेगा। दूसरी ओर अगर किसी सार्थक आलोचना से बौखला कर नारद के लोग अगर चिट्ठा बैन करते हैं तो यह उनकी तानाशाही होगी। यह सब 'सब्जेक्टिव' है। कोपरनिकस, गैलीलियो के उदाहरण पेश करने वाले से यह अपेक्षा सहज है कि वह कम से कम खुले में सामने आकर अपनी बात कहे।

जीतेंन्द्र, सृजनशिल्पी से अनुरोध है कि वे मेरे सबेरे के कमेंट को अपना विरोध न समझें। मुझे उनका विरोध करना होगा, किसी भी बात का, तो सामने करूंगा अपने ब्लाग पर-कहीं कोने में टिप्पणी करके नहीं।

अगर आलोचकजी सही में मसिजीवी जी नहीं हैं तो मैं मसिजीवीजी से क्षमाचाहता हूं। कर सकें तो कर दें न कर सकें तो जो सजा दें कबूल है।

मैं अभी भी मानता हूं कि ब्लागिंग को लेकर किसी आचार संहिता की बात खामख्याली ही होगी। जो लोग ब्लागिंग से जुड़े होंगे उनके व्यवहार ही ब्लागिंग की आचार संहिता तय करेंगे।

एक अनसुलझी पहेली : जिन्दगी ने कहा…

यह फालतू की बै-सिर पैर की आलोचनाएं करना बन्द कीजिये। यह आलोचना करके आप क्यूं अपने को अनपढ, गंवार और जाहिल साबित करना चाहते हैं.... समझ से परे हैं। वैसे आप जो भी हैं यह तो मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि एक व्यक्ति दो भूमिकाएं निभा रहा है। क्या बात है दोहरी जिन्दगी जीना तो कोई आपसे सीखे। मेरा निवेदन है कि पहले कुछ अच्छी आलोचना पढना सीखें। उसके बाद ही कुछ लिखने की कोशिश करेंगे तो ज्यादा अच्छा होगा। यह छिपने का नाटक क्यूं... क्या डरते हैं आप लोगों। यह पहचान क्यूं छिपाते हैं आप। सामने आइये। आप तो शायद दिल्ली में है न। सामने आइये और फिर मैं आपसे बात करता हूं आलोचना की और आलोचना की परिभाषा की। मुझे तो नहीं लगता कि आपको शायद यह भी पता नहीं होगा कि आलोचना शब्द किन संधियों से मिलकर बना होता है। अगर है हिम्मत तो बताइये अपना सही नाम। और अगर आप डरपोक हैं तो बन्द कर दीजिये इस ब्लाग। महज अपने अहम की संतुष्टि के लिये कुछ भी कचरा लिख देते हैं। आप जैसे लोगों ने ही साहित्य की विधाओं को बदनाम किया हुआ है।

एक अनसुलझी पहेली : जिन्दगी ने कहा…

शर्म आती है आप पर और आपकी जाहिल टिप्पणियों पर। अगर कुछ भी शर्म बाकी हो तो चुल्लू भर पानी में डूब जाइये। समझते क्या हैं आप अपने आपको। कभी जिन्दगी में सही आलोचना लिखी है आपने। मुझे गिने चुने विख्यात आलोचकों के नाम उनकी समीक्षक पुस्तक के साथ ही बता दीजिये.... असंभव आप बता नहीं पाएंगे मि. मसिजीवी एण्ड मि. आलोचक। अब जैसे लोग आलोचना की विधा का गलत उपयोग करते हैं।

masijeevi ने कहा…

हा हा हा
शॉंत भीम शॉंत
अपूर्वजी अभी आपके पास समय की कमी थी पर आलोचकजी पर आपने इतनी मेहरबानी की लगता है सुबह से यहीं जमे हैं...धन्‍यवाद
अपने ज्ञान व सभ्‍यता का भरपूर परिचय आपकी भाषा दे ही रही है, खैर वह तो जैसा कि रतलामी कहते हैं ....इंटरनेट की दुनिया में सदैव के लिए दर्ज हो गया है, आपसे और आलोचकजी से अनुरोध कि इसे मिटाएं न।
अब देखें कि आपने इस भाषा के अनन्‍तर कुछ काम की बातें भी लिखी हैं- आपकी आपत्ति है कि आलोचक और मुझे, आलोचना का ककहरा नहीं आता। बेचारे आलोचक ने तो कभी कहा ही पहीं कि वे हिंदी वाले हैं, उनकी पहली पोस्‍ट की हिंदी देखने से तो लगता है कि बेचारे एकदम शुरूआती हिंदी के पाठ पढ़ रहे हैं। दूसरी आपत्ति मेरे बारे में है- मैं यहॉं कोई कक्षा लेने या देने नहीं आया हूँ (उसके लिए एक नया ब्‍लॉग शुरू किया है..आपका स्‍वागत रहेगा वहॉं भी)
अब साहित्‍यालोचना के वकील बनकर आए हैं तो कृपया ध्‍यान दें कि चिट्ठाकारी एक नया व्‍याकरण है उसे बख्‍श दें।
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और हॉं ।। संधि
मेरी एम ए (प्रीवियस) की प्‍यारी सी छात्रा का नाम है। अगले साल फाइनल में उसका पत्रकारिता का विकल्‍प लेने का इरादा है।

Anupam Pachauri ने कहा…

जनाब आलोचना के मुंतज़र हैँ हम भी। http://naadkari.blogspot.com/ पर लिखेँ।

अनुपम

मै एक इन्डीविजुअल